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||अहिरा माहटर||

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व्यंगकार : प्रभाकर चौबे। ____________________ पढ़ाई अब कहां होता ।अब तअ मोबाइले पढ़ी लिहल जाता। आनी बेर तअ लडिका बड़का चिरुकि राखत रहले। औरी ओकरा में रसरी बान्ही के खूंटी में लटका देसु की नींद मत लागो।  एक जाना लगले रटे।  अनावृष्टि में दहाड़ होता है अति वृष्टि में सुखाड़ होता है। ईहे परीक्षा में लिख दिहलस। लड्डू आ गईल। अब बाबू जी लगले मारे ।ससुरा रात भर रटलस ढिबरी जलवलस तेल जियान कईलस आ नाक कटववलस लड्डू ले आइल बा। गईले बपसी अहिरा माहटर साहेब से पूछे तअ बोलले की  लईका कमजोर बा। तब बपसी बोलले की दूध के कमी नईखेL लगहर बिया। ई दूध पियते बा। घिव के बिना लिट्टी ना दियाय ।मट्ठा पिएते बा ।मास्टर साहेब कोनो कमी नईखे। दु जाना के त एके बेरी में पटकी देला ।अब का खियाई की पास करो।  बोलले घर में ट्यूशन पढ़ावे आवत बानी। चाहें तअ पढ़िए जयीहें न तअ पढ़ाई छोड़िए दिहें। ढिबरी के तेल तअ बांची। बपसी तअ ईहे चाहत रहले की गईया चरावो खेती में हाथ बटावो। पड़ोसी के लईकन्ही के देखा देखी मेहरारू के कहला पर पेंचे स्कूल भेजत रहले। तनिको सुहात ना रहे।  दोसरा दिने माहटर साहेब आ ग...