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आदि गुरु शंकराचार्य जी के ,जन्म दिवस पर विशेष आलेख।

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भारत की अधिकांश जनता सनातन धर्म से ही नि: सृत बौद्ध दर्शन को धर्म मान चुकी थी।जो सनातन धर्मी थे वे भी भ्रमित हो चुके थे । बौद्ध मत धर्म का रूप ले चुका था और उसे राज्याश्रय प्राप्त था। बौद्ध अपने मूल सनातन को ही नष्ट करने में लग चुके थे और सनातनियों को सता भी रहे थे। सर्वत्र पाखंड फैला था । बौद्ध तंत्र का बोलबाला था। जिस बुद्ध ने मूर्ति पूजा का समर्थन किया न विरोध ।कर्मकांड का समर्थन किया न विरोध। न ही खुद को ईश्वर कहा। कपिल मुनि के संख्या दर्शन को बौद्ध दर्शन के रूप में प्रचारित किया।उन्होंने मात्र जीवन के रहस्य बताए और तृष्णा को ही दुखों का मूल बताया। जो सनातन धर्म का एक दर्शन और जीवन पद्धति मात्रा थी न तो सनातन धर्म मार्ग को छोड़ने की बात कही न खुद छोड़ा। लेकिन उनके शिष्यों ने केजरीवाल बनकर अन्ना को उड़ा दिया। पैगोडा बनने लगे बड़ी बड़ी बुद्ध मूर्तियां जो शांति की जगह रहस्यमयता और भयानकता का प्रदर्शन करने लगी। उनको हिंदू रीति से भोग लगाए जाने लगे । कभी बुद्ध ने ऐसा नहीं कहा था। विष्णु के अवतार होने पर भी उनकी पूजा हिंदू नही करते मात्र संकल्प में बुद्ध अवतार का नाम लेते हैं। हमारे...